Tuesday, October 28, 2025

0005 - उभय लिङ्ग और उभय विभूति के स्वामी

श्रीः

जय गरुड सुपर्णः 

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 उभय लिङ्ग और उभय विभूति के स्वामी

स्वामी रामानुजाचार्य के सम्प्रदाय का एक बहुत महत्वपूर्ण सिद्धान्त है — परमात्मा के उभय लिङ्ग (दो विशेष चिन्ह) और उभय विभूति (दो ऐश्वर्य)।
“उभय” का अर्थ है “दो।”
इसलिए “उभय लिङ्ग वाला परमात्मा” का अर्थ है — ऐसा परमात्मा जिसके दो चिन्ह हैं।
वे दो चिन्ह हैं —
  1. हेय-प्रत्यनीकत्वम् (दोष रहित होना), और 
  2. कल्याणैकतानत्वम् (सभी शुभ गुणों से युक्त होना)।
इसका अर्थ है कि परमात्मा में कोई भी दोष नहीं है और वे अनंत कल्याण गुणों से सम्पन्न हैं।
अब “उभय विभूति नाथ” का अर्थ है — वह जो दो प्रकार की विभूतियों (संपत्तियों/लोकों) का स्वामी है।
वे दो विभूतियाँ हैं —
  1. नित्य विभूति, और
  2. लीला विभूति।
नित्य विभूति वह है जिसे श्री वैकुण्ठ कहा जाता है — जहाँ केवल आनंद ही आनंद है। वहाँ परमात्मा, श्रीदेवी, भूदेवी, नीलादेवी, नित्य  आत्माएँ और मुक्त आत्माएँ निवास करते हैं।
लीला विभूति वह है जिसमें सुख और दुख दोनों हैं — यह वही प्रकृति मंडल है जिसमें हम अभी रहते हैं।
परमात्मा नित्य विभूति से लीला विभूति में अवतरित होकर, अनेक अवतार लेकर, हमारे जैसे जीवों को मोक्ष तट (मुक्ति) तक पहुँचाते हैं।

संस्कृत वेदों और तमिल वेदों (आळवारों के पासुरों) को दो नेत्रों की तरह मानने वाले ही स्वामी रामानुज सम्प्रदाय के अनुयायी हैं — इन्हें उभय वेदान्ती कहा जाता है।

आचार्यों के उपदेश के अनुसार, भक्ती या प्रपत्ति के मार्ग से, परमात्मा के उभय लिङ्ग का ध्यान करते हुए, लीला विभूति से नित्य विभूति की ओर जाना ही हमारे जैसे जीवों का परम लक्ष्य है। यही मोक्ष कहलाता है। 

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जय गरुड सुपर्णः

श्री देशिक दिव्य पादुका सेवक वाचस्पति डॉ. श्री उ.वे. मुकुन्दगिरि वङ्कीपुरम् अनन्त पद्मनाभाचार्य (श्री ए.पी.एन. (APN) स्वामीजी)
 
की शिष्या
अडियेन 
श्रीरंजनि जगन्नाथन
(सम्प्रदाय अनुष्ठान रक्षण अभिमान - SARAN सेवक)
28-10-2025

Friday, October 17, 2025

0004 - आचार्य संबंध की महिमा और आवश्यकता - पुण्डरीक & क्षत्रबन्धु,

श्रीः

जय गरुड सुपर्णः 

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आचार्य संबंध की महिमा और आवश्यकता 

स्वामी श्री वेदांत देशिकाचार्य  ने श्रीमद्रहस्यत्रयसारः ग्रन्थ के गुरुपरम्परासारः नामक अध्याय में आचार्य संबंध (गुरु से संबंध) के महत्व को स्पष्ट किया है।

उन्होंने कहा है –

‘‘पापिष्ठः क्षत्रबन्धुश्च पुण्डरीकश्च पुण्यकृत् ।

आचार्यवत्तया मुक्तौ तस्मात् आचार्यवान् भवेत् ॥’’

अर्थात् – अत्यंत पापी क्षत्रबन्धु और अत्यंत पुण्यवान् पुण्डरीक — दोनों ही अपने-अपने आचार्यों के साथ संबंध रखने के कारण मोक्ष को प्राप्त हुए। इसलिए, प्रत्येक व्यक्ति को आचार्य का शिष्य बनना चाहिए।

अब आइए, हम पुण्डरीक और क्षत्रबन्धु — इन दोनों की कथाओं को देखें।

1. पुण्डरीक की कथा

पुण्डरीक नामक एक धनवान ब्राह्मण वेदों का विधिपूर्वक अध्ययन करता था और धर्मानुष्ठान तत्पर रहता था। वह अपने माता-पिता की सेवा करता हुआ, तीर्थयात्राएँ करता और पापों का नाश कर पुण्यस्थलों में निवास करता था। वह भक्तियोग में लगा रहता, फिर भी उसे भगवान का साक्षात्कार नहीं हुआ।

एक दिन उसका साक्षात्कार देवर्षि नारद से हुआ। नारद मुनि ने उसे अष्टाक्षर मंत्र की महिमा बताई और उसका उपदेश दिया। पुण्डरीक ने उस मंत्र में निष्ठा रखी, और उसके अभ्यास के द्वारा उसने भगवान का साक्षात्कार कर मोक्ष प्राप्त किया।

यह कथा श्री पाद्मोत्तर पुराण (खंड 6, अध्याय 81) और इतिहाससमुच्चय (अध्याय 23) में उल्लिखित है।

2. क्षत्रबन्धु की कथा

क्षत्रबन्धु नामक एक राजा दुष्ट आचरण वाला था। उसके स्वजन उसे तिरस्कृत कर जंगल में छोड़ गए। वह वहाँ तपस्वियों को सताता था। संयोगवश, एक दिन उसकी भेंट नारद मुनि से हुई। अपनी आदत के अनुसार वह नारद को मारने के लिए डंडा उठाकर आगे बढ़ा।

तब नारद मुनि ने कहा – “तुम अपने परिवार की रक्षा के लिए जो पाप करते हो, क्या तुम्हारा परिवार उन पापों में भागीदार बनता है? जाकर पता लगाओ।”

यह सुनकर क्षत्रबन्धु को थोड़ी बुद्धि जागी। वह घर गया और परिवार से पूछा, परंतु उन्होंने कहा कि वे उसके पापों में कोई भाग नहीं लेंगे। तब वह पुनः नारद के पास लौट आया और कहा, “मैंने अज्ञान के कारण अनेक पाप किए हैं, अब उनसे मुक्त होने का उपाय बताइए।”

नारद मुनि ने दया करके उसे उपदेश दिया, साधना का मार्ग बताया, और उसी के द्वारा वह मोक्ष को प्राप्त हुआ।

यह कथा उपदेश परम्परा में प्रचलित है।

क्षत्रबन्धु की कथा - विष्णु धर्म के अनुसार 

श्री विष्णु धर्म (अध्याय 92) में यह कथा थोड़ी भिन्न रूप में आती है। उसमें कहा गया है —

क्षत्रिय कुल में जन्मा क्षत्रबन्धु पापाचारी था और हिंसा करता हुआ वन में भटकता था।

एक दिन, तीव्र धूप में तपस्या करते हुए और मार्ग भटकते हुए एक मुनि वहाँ पहुँचे। क्षत्रबन्धु ने करुणा से प्रेरित होकर उनकी सहायता की। जब वे मुनि प्यास से व्याकुल होकर जल पीने तालाब में उतरे, तो फिसलकर उसमें गिर गए। क्षत्रबन्धु ने उन्हें बाहर निकाला, कमल कंद खिलाकर उनकी भूख मिटाई और उनका आदरपूर्वक सेवा की।

यह उसके जीवन का एकमात्र शुभ कर्म था।

मुनि ने उसका परिचय पूछा। क्षत्रबन्धु ने अपने सभी दुष्कर्म बताकर अपनी नीचता स्वीकार की। मुनि ने उसे धर्ममार्ग पर लाने का प्रयत्न किया, पर उसने कहा कि वह पापमय जीवन में रमा हुआ है और बदल नहीं सकता। तब वह मुनि के चरणों में गिर पड़ा।

मुनि ने उसे सलाह दी — “कम से कम गोविन्द नाम का उच्चारण करते रहो।”

क्षत्रबन्धु ने वैसा ही किया। धीरे-धीरे वह सुधर गया, मोक्ष का उपाय अपनाया और भगवान के चरणों को प्राप्त कर शाश्वत सुख को पाया।

इस प्रकार, मुनि के चरणों में शरण लेने के कारण क्षत्रबन्धु को कल्याण प्राप्त हुआ।

पुण्डरीक और क्षत्रबन्धु ने मोक्ष इसीलिए प्राप्त किया, न कि उनके पुण्य–पाप कर्मों के कारण, बल्कि उनके आचार्य संबंध (गुरु से संबंध) के कारण।

हम सभी आचार्य संबंध की महिमा और आवश्यकता को समझें और अपने आचार्यों के पास जाएँ तथा उनके मार्गदर्शन के अनुसार अपना जीवन चलाएँ।

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जय गरुड सुपर्णः

श्री देशिक दिव्य पादुका सेवक वाचस्पति डॉ. श्री उ.वे. मुकुन्दगिरि वङ्कीपुरम् अनन्त पद्मनाभाचार्य (श्री ए.पी.एन. (APN) स्वामीजी)
 
की शिष्या
अडियेन 
श्रीरंजनि जगन्नाथन
(सम्प्रदाय अनुष्ठान रक्षण अभिमान - SARAN सेवक)
17-10-2025

0003 - आचार्यों की महानता

श्रीः

जय गरुड सुपर्णः 

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0003 - आचार्यों की महानता 

आचार्यों की महिमा

स्वामी श्री वेदांत देशिकाचार्य  ने “श्रीमद्रहस्यत्रयसारः” के गुरुपरंपरासार:  में आचार्यों की महानता और उनके द्वारा शिष्यों को दी जाने वाली कृपा को अत्यंत सुंदर रीति से एक श्लोक के माध्यम से समझाया है —

श्लोकः —
एते मह्यमपोढ मन्मथ शरोन्माथाय नाथादयः ।
त्रैय्यन्त प्रति-नन्दनीय विविधो-दन्ताः स्वदन्तामिह ।
श्रद्धातव्य-शरण्य-दंपति-दया दिव्यापगा-व्यापकाः ।
स्पर्धा-विप्लव-विप्रलम्भ-पदवी वैदेशिका देशिकाः ॥
(श्रीगुरुपरंपरासारः — श्रीमद्रहस्यत्रयसारः )

भावार्थ:
श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के आचार्यगण नाथमुनि आदि  कैसे हैं?

1) वे ऐसे महापुरुष हैं जिनका चरित्र इतना पवित्र और आदर्श है कि स्वयं वेदांत शास्त्र उनकी महिमा का गुणगान करते हैं।

2)  वे कल्याणगुणों से संपन्न दिव्य दम्पति — श्री लक्ष्मी-नारायण — की करुणा रूपी गंगा को इस संसार में प्रवाहित करते हैं, जिससे हम सब उनके चरणों में शरणागति प्राप्त कर सकें।

3) वे अहंकार, छल-कपट, प्रतिस्पर्धा, और असत्य आचरण से सदा दूर रहते हैं।

ऐसे आचार्य ही हमें मन विकारों और कामदेव के वश से मुक्त करते हैं।
उनकी कृपा से हम परमपद को प्राप्त होकर अनन्त आनन्द का अनुभव कर सकें — यही हमारी प्रार्थना है।

भगीरथ के महान प्रयत्न के समान 

श्री ए.पी.एन. स्वामी ने इस श्लोक का भाव स्पष्ट करते हुए आचार्यों की करुणा और उनके उपकारों के अनेक अद्भुत पहलू अत्यंत सुंदर रूप में बताए।

भगवान्‌ के परम भक्त भगीरथ के समान ही हमारे आचार्यगण भी हैं।

जिस प्रकार भगीरथ ने अपने पितरों की मुक्ति के लिए अद्भुत तप किया और सत्यलोक से गंगा को पृथ्वी पर लाकर अपने पितरों को उद्धार प्रदान किया, उसी प्रकार हम सब भी संस्काररहित, जले हुए भस्म के समान जीवन जी रहे हैं — संस्कारहीन, संसार-ताप से तप्त जीवात्माएँ

ऐसे समय में हमें उद्धार देने वाली केवल एक ही शक्ति है —
श्रीमन नारायण और श्री महालक्ष्मी की दया रूपी करुणा-गंगा (दया–करुणा–प्रवाहम्)।

और इस दिव्य करुणा-गंगा को हम तक पहुँचाने वाले हमारे आचार्य ही हैं।

इस उपमा का भाव इस प्रकार है —

उपमा -  दार्शनिक अर्थ  - संस्कृत शब्द

1) भगीरथ  - आचार्यगण - नाथादयः, देशिकाः

2) गंगा - दिव्य दम्पति की दया – प्रवाह दिव्यापगा

3) भगीरथ के पितर - संसार में फँसे हुए जीवात्मा

जब आचार्यों के माध्यम से श्रीमन नारायण और श्रीदेवी की यह दया–गंगा हमारे भीतर प्रवाहित होती है, तब हमारे भीतर के काम, लोभ, और मनमथ-बाण जन्य विकार दूर हो जाते हैं।  मन शुद्ध, निर्मल और शांत हो जाता है।

स्वामीजी श्री वेदांत देशिकाचार्य  ने  कहते हैं कि आचार्य और उनके उपदेश सदा हमारे हृदय में निवास करें — वे हमारे मार्गदर्शक बनें और हमें इस संसार के ताप से मुक्त कर परम आनन्द की ओर ले जाएँ।

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जय गरुड सुपर्णः

श्री देशिक दिव्य पादुका सेवक वाचस्पति डॉ. श्री उ.वे. मुकुन्दगिरि वङ्कीपुरम् अनन्त पद्मनाभाचार्य (श्री ए.पी.एन. (APN) स्वामीजी)
 
की शिष्या
अडियेन 
श्रीरंजनि जगन्नाथन
(सम्प्रदाय अनुष्ठान रक्षण अभिमान - SARAN सेवक)
17-10-2025