Tuesday, October 28, 2025

0005 - उभय लिङ्ग और उभय विभूति के स्वामी

श्रीः

जय गरुड सुपर्णः 

🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸

 उभय लिङ्ग और उभय विभूति के स्वामी

स्वामी रामानुजाचार्य के सम्प्रदाय का एक बहुत महत्वपूर्ण सिद्धान्त है — परमात्मा के उभय लिङ्ग (दो विशेष चिन्ह) और उभय विभूति (दो ऐश्वर्य)।
“उभय” का अर्थ है “दो।”
इसलिए “उभय लिङ्ग वाला परमात्मा” का अर्थ है — ऐसा परमात्मा जिसके दो चिन्ह हैं।
वे दो चिन्ह हैं —
  1. हेय-प्रत्यनीकत्वम् (दोष रहित होना), और 
  2. कल्याणैकतानत्वम् (सभी शुभ गुणों से युक्त होना)।
इसका अर्थ है कि परमात्मा में कोई भी दोष नहीं है और वे अनंत कल्याण गुणों से सम्पन्न हैं।
अब “उभय विभूति नाथ” का अर्थ है — वह जो दो प्रकार की विभूतियों (संपत्तियों/लोकों) का स्वामी है।
वे दो विभूतियाँ हैं —
  1. नित्य विभूति, और
  2. लीला विभूति।
नित्य विभूति वह है जिसे श्री वैकुण्ठ कहा जाता है — जहाँ केवल आनंद ही आनंद है। वहाँ परमात्मा, श्रीदेवी, भूदेवी, नीलादेवी, नित्य  आत्माएँ और मुक्त आत्माएँ निवास करते हैं।
लीला विभूति वह है जिसमें सुख और दुख दोनों हैं — यह वही प्रकृति मंडल है जिसमें हम अभी रहते हैं।
परमात्मा नित्य विभूति से लीला विभूति में अवतरित होकर, अनेक अवतार लेकर, हमारे जैसे जीवों को मोक्ष तट (मुक्ति) तक पहुँचाते हैं।

संस्कृत वेदों और तमिल वेदों (आळवारों के पासुरों) को दो नेत्रों की तरह मानने वाले ही स्वामी रामानुज सम्प्रदाय के अनुयायी हैं — इन्हें उभय वेदान्ती कहा जाता है।

आचार्यों के उपदेश के अनुसार, भक्ती या प्रपत्ति के मार्ग से, परमात्मा के उभय लिङ्ग का ध्यान करते हुए, लीला विभूति से नित्य विभूति की ओर जाना ही हमारे जैसे जीवों का परम लक्ष्य है। यही मोक्ष कहलाता है। 

🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸

जय गरुड सुपर्णः

श्री देशिक दिव्य पादुका सेवक वाचस्पति डॉ. श्री उ.वे. मुकुन्दगिरि वङ्कीपुरम् अनन्त पद्मनाभाचार्य (श्री ए.पी.एन. (APN) स्वामीजी)
 
की शिष्या
अडियेन 
श्रीरंजनि जगन्नाथन
(सम्प्रदाय अनुष्ठान रक्षण अभिमान - SARAN सेवक)
28-10-2025

No comments:

Post a Comment