Friday, October 17, 2025

0003 - आचार्यों की महानता

श्रीः

जय गरुड सुपर्णः 

🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸

0003 - आचार्यों की महानता 

आचार्यों की महिमा

स्वामी श्री वेदांत देशिकाचार्य  ने “श्रीमद्रहस्यत्रयसारः” के गुरुपरंपरासार:  में आचार्यों की महानता और उनके द्वारा शिष्यों को दी जाने वाली कृपा को अत्यंत सुंदर रीति से एक श्लोक के माध्यम से समझाया है —

श्लोकः —
एते मह्यमपोढ मन्मथ शरोन्माथाय नाथादयः ।
त्रैय्यन्त प्रति-नन्दनीय विविधो-दन्ताः स्वदन्तामिह ।
श्रद्धातव्य-शरण्य-दंपति-दया दिव्यापगा-व्यापकाः ।
स्पर्धा-विप्लव-विप्रलम्भ-पदवी वैदेशिका देशिकाः ॥
(श्रीगुरुपरंपरासारः — श्रीमद्रहस्यत्रयसारः )

भावार्थ:
श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के आचार्यगण नाथमुनि आदि  कैसे हैं?

1) वे ऐसे महापुरुष हैं जिनका चरित्र इतना पवित्र और आदर्श है कि स्वयं वेदांत शास्त्र उनकी महिमा का गुणगान करते हैं।

2)  वे कल्याणगुणों से संपन्न दिव्य दम्पति — श्री लक्ष्मी-नारायण — की करुणा रूपी गंगा को इस संसार में प्रवाहित करते हैं, जिससे हम सब उनके चरणों में शरणागति प्राप्त कर सकें।

3) वे अहंकार, छल-कपट, प्रतिस्पर्धा, और असत्य आचरण से सदा दूर रहते हैं।

ऐसे आचार्य ही हमें मन विकारों और कामदेव के वश से मुक्त करते हैं।
उनकी कृपा से हम परमपद को प्राप्त होकर अनन्त आनन्द का अनुभव कर सकें — यही हमारी प्रार्थना है।

भगीरथ के महान प्रयत्न के समान 

श्री ए.पी.एन. स्वामी ने इस श्लोक का भाव स्पष्ट करते हुए आचार्यों की करुणा और उनके उपकारों के अनेक अद्भुत पहलू अत्यंत सुंदर रूप में बताए।

भगवान्‌ के परम भक्त भगीरथ के समान ही हमारे आचार्यगण भी हैं।

जिस प्रकार भगीरथ ने अपने पितरों की मुक्ति के लिए अद्भुत तप किया और सत्यलोक से गंगा को पृथ्वी पर लाकर अपने पितरों को उद्धार प्रदान किया, उसी प्रकार हम सब भी संस्काररहित, जले हुए भस्म के समान जीवन जी रहे हैं — संस्कारहीन, संसार-ताप से तप्त जीवात्माएँ

ऐसे समय में हमें उद्धार देने वाली केवल एक ही शक्ति है —
श्रीमन नारायण और श्री महालक्ष्मी की दया रूपी करुणा-गंगा (दया–करुणा–प्रवाहम्)।

और इस दिव्य करुणा-गंगा को हम तक पहुँचाने वाले हमारे आचार्य ही हैं।

इस उपमा का भाव इस प्रकार है —

उपमा -  दार्शनिक अर्थ  - संस्कृत शब्द

1) भगीरथ  - आचार्यगण - नाथादयः, देशिकाः

2) गंगा - दिव्य दम्पति की दया – प्रवाह दिव्यापगा

3) भगीरथ के पितर - संसार में फँसे हुए जीवात्मा

जब आचार्यों के माध्यम से श्रीमन नारायण और श्रीदेवी की यह दया–गंगा हमारे भीतर प्रवाहित होती है, तब हमारे भीतर के काम, लोभ, और मनमथ-बाण जन्य विकार दूर हो जाते हैं।  मन शुद्ध, निर्मल और शांत हो जाता है।

स्वामीजी श्री वेदांत देशिकाचार्य  ने  कहते हैं कि आचार्य और उनके उपदेश सदा हमारे हृदय में निवास करें — वे हमारे मार्गदर्शक बनें और हमें इस संसार के ताप से मुक्त कर परम आनन्द की ओर ले जाएँ।

🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
जय गरुड सुपर्णः

श्री देशिक दिव्य पादुका सेवक वाचस्पति डॉ. श्री उ.वे. मुकुन्दगिरि वङ्कीपुरम् अनन्त पद्मनाभाचार्य (श्री ए.पी.एन. (APN) स्वामीजी)
 
की शिष्या
अडियेन 
श्रीरंजनि जगन्नाथन
(सम्प्रदाय अनुष्ठान रक्षण अभिमान - SARAN सेवक)
17-10-2025

No comments:

Post a Comment