Tuesday, October 28, 2025

0005 - उभय लिङ्ग और उभय विभूति के स्वामी

श्रीः

जय गरुड सुपर्णः 

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 उभय लिङ्ग और उभय विभूति के स्वामी

स्वामी रामानुजाचार्य के सम्प्रदाय का एक बहुत महत्वपूर्ण सिद्धान्त है — परमात्मा के उभय लिङ्ग (दो विशेष चिन्ह) और उभय विभूति (दो ऐश्वर्य)।
“उभय” का अर्थ है “दो।”
इसलिए “उभय लिङ्ग वाला परमात्मा” का अर्थ है — ऐसा परमात्मा जिसके दो चिन्ह हैं।
वे दो चिन्ह हैं —
  1. हेय-प्रत्यनीकत्वम् (दोष रहित होना), और 
  2. कल्याणैकतानत्वम् (सभी शुभ गुणों से युक्त होना)।
इसका अर्थ है कि परमात्मा में कोई भी दोष नहीं है और वे अनंत कल्याण गुणों से सम्पन्न हैं।
अब “उभय विभूति नाथ” का अर्थ है — वह जो दो प्रकार की विभूतियों (संपत्तियों/लोकों) का स्वामी है।
वे दो विभूतियाँ हैं —
  1. नित्य विभूति, और
  2. लीला विभूति।
नित्य विभूति वह है जिसे श्री वैकुण्ठ कहा जाता है — जहाँ केवल आनंद ही आनंद है। वहाँ परमात्मा, श्रीदेवी, भूदेवी, नीलादेवी, नित्य  आत्माएँ और मुक्त आत्माएँ निवास करते हैं।
लीला विभूति वह है जिसमें सुख और दुख दोनों हैं — यह वही प्रकृति मंडल है जिसमें हम अभी रहते हैं।
परमात्मा नित्य विभूति से लीला विभूति में अवतरित होकर, अनेक अवतार लेकर, हमारे जैसे जीवों को मोक्ष तट (मुक्ति) तक पहुँचाते हैं।

संस्कृत वेदों और तमिल वेदों (आळवारों के पासुरों) को दो नेत्रों की तरह मानने वाले ही स्वामी रामानुज सम्प्रदाय के अनुयायी हैं — इन्हें उभय वेदान्ती कहा जाता है।

आचार्यों के उपदेश के अनुसार, भक्ती या प्रपत्ति के मार्ग से, परमात्मा के उभय लिङ्ग का ध्यान करते हुए, लीला विभूति से नित्य विभूति की ओर जाना ही हमारे जैसे जीवों का परम लक्ष्य है। यही मोक्ष कहलाता है। 

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जय गरुड सुपर्णः

श्री देशिक दिव्य पादुका सेवक वाचस्पति डॉ. श्री उ.वे. मुकुन्दगिरि वङ्कीपुरम् अनन्त पद्मनाभाचार्य (श्री ए.पी.एन. (APN) स्वामीजी)
 
की शिष्या
अडियेन 
श्रीरंजनि जगन्नाथन
(सम्प्रदाय अनुष्ठान रक्षण अभिमान - SARAN सेवक)
28-10-2025

Friday, October 17, 2025

0004 - आचार्य संबंध की महिमा और आवश्यकता - पुण्डरीक & क्षत्रबन्धु,

श्रीः

जय गरुड सुपर्णः 

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आचार्य संबंध की महिमा और आवश्यकता 

स्वामी श्री वेदांत देशिकाचार्य  ने श्रीमद्रहस्यत्रयसारः ग्रन्थ के गुरुपरम्परासारः नामक अध्याय में आचार्य संबंध (गुरु से संबंध) के महत्व को स्पष्ट किया है।

उन्होंने कहा है –

‘‘पापिष्ठः क्षत्रबन्धुश्च पुण्डरीकश्च पुण्यकृत् ।

आचार्यवत्तया मुक्तौ तस्मात् आचार्यवान् भवेत् ॥’’

अर्थात् – अत्यंत पापी क्षत्रबन्धु और अत्यंत पुण्यवान् पुण्डरीक — दोनों ही अपने-अपने आचार्यों के साथ संबंध रखने के कारण मोक्ष को प्राप्त हुए। इसलिए, प्रत्येक व्यक्ति को आचार्य का शिष्य बनना चाहिए।

अब आइए, हम पुण्डरीक और क्षत्रबन्धु — इन दोनों की कथाओं को देखें।

1. पुण्डरीक की कथा

पुण्डरीक नामक एक धनवान ब्राह्मण वेदों का विधिपूर्वक अध्ययन करता था और धर्मानुष्ठान तत्पर रहता था। वह अपने माता-पिता की सेवा करता हुआ, तीर्थयात्राएँ करता और पापों का नाश कर पुण्यस्थलों में निवास करता था। वह भक्तियोग में लगा रहता, फिर भी उसे भगवान का साक्षात्कार नहीं हुआ।

एक दिन उसका साक्षात्कार देवर्षि नारद से हुआ। नारद मुनि ने उसे अष्टाक्षर मंत्र की महिमा बताई और उसका उपदेश दिया। पुण्डरीक ने उस मंत्र में निष्ठा रखी, और उसके अभ्यास के द्वारा उसने भगवान का साक्षात्कार कर मोक्ष प्राप्त किया।

यह कथा श्री पाद्मोत्तर पुराण (खंड 6, अध्याय 81) और इतिहाससमुच्चय (अध्याय 23) में उल्लिखित है।

2. क्षत्रबन्धु की कथा

क्षत्रबन्धु नामक एक राजा दुष्ट आचरण वाला था। उसके स्वजन उसे तिरस्कृत कर जंगल में छोड़ गए। वह वहाँ तपस्वियों को सताता था। संयोगवश, एक दिन उसकी भेंट नारद मुनि से हुई। अपनी आदत के अनुसार वह नारद को मारने के लिए डंडा उठाकर आगे बढ़ा।

तब नारद मुनि ने कहा – “तुम अपने परिवार की रक्षा के लिए जो पाप करते हो, क्या तुम्हारा परिवार उन पापों में भागीदार बनता है? जाकर पता लगाओ।”

यह सुनकर क्षत्रबन्धु को थोड़ी बुद्धि जागी। वह घर गया और परिवार से पूछा, परंतु उन्होंने कहा कि वे उसके पापों में कोई भाग नहीं लेंगे। तब वह पुनः नारद के पास लौट आया और कहा, “मैंने अज्ञान के कारण अनेक पाप किए हैं, अब उनसे मुक्त होने का उपाय बताइए।”

नारद मुनि ने दया करके उसे उपदेश दिया, साधना का मार्ग बताया, और उसी के द्वारा वह मोक्ष को प्राप्त हुआ।

यह कथा उपदेश परम्परा में प्रचलित है।

क्षत्रबन्धु की कथा - विष्णु धर्म के अनुसार 

श्री विष्णु धर्म (अध्याय 92) में यह कथा थोड़ी भिन्न रूप में आती है। उसमें कहा गया है —

क्षत्रिय कुल में जन्मा क्षत्रबन्धु पापाचारी था और हिंसा करता हुआ वन में भटकता था।

एक दिन, तीव्र धूप में तपस्या करते हुए और मार्ग भटकते हुए एक मुनि वहाँ पहुँचे। क्षत्रबन्धु ने करुणा से प्रेरित होकर उनकी सहायता की। जब वे मुनि प्यास से व्याकुल होकर जल पीने तालाब में उतरे, तो फिसलकर उसमें गिर गए। क्षत्रबन्धु ने उन्हें बाहर निकाला, कमल कंद खिलाकर उनकी भूख मिटाई और उनका आदरपूर्वक सेवा की।

यह उसके जीवन का एकमात्र शुभ कर्म था।

मुनि ने उसका परिचय पूछा। क्षत्रबन्धु ने अपने सभी दुष्कर्म बताकर अपनी नीचता स्वीकार की। मुनि ने उसे धर्ममार्ग पर लाने का प्रयत्न किया, पर उसने कहा कि वह पापमय जीवन में रमा हुआ है और बदल नहीं सकता। तब वह मुनि के चरणों में गिर पड़ा।

मुनि ने उसे सलाह दी — “कम से कम गोविन्द नाम का उच्चारण करते रहो।”

क्षत्रबन्धु ने वैसा ही किया। धीरे-धीरे वह सुधर गया, मोक्ष का उपाय अपनाया और भगवान के चरणों को प्राप्त कर शाश्वत सुख को पाया।

इस प्रकार, मुनि के चरणों में शरण लेने के कारण क्षत्रबन्धु को कल्याण प्राप्त हुआ।

पुण्डरीक और क्षत्रबन्धु ने मोक्ष इसीलिए प्राप्त किया, न कि उनके पुण्य–पाप कर्मों के कारण, बल्कि उनके आचार्य संबंध (गुरु से संबंध) के कारण।

हम सभी आचार्य संबंध की महिमा और आवश्यकता को समझें और अपने आचार्यों के पास जाएँ तथा उनके मार्गदर्शन के अनुसार अपना जीवन चलाएँ।

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जय गरुड सुपर्णः

श्री देशिक दिव्य पादुका सेवक वाचस्पति डॉ. श्री उ.वे. मुकुन्दगिरि वङ्कीपुरम् अनन्त पद्मनाभाचार्य (श्री ए.पी.एन. (APN) स्वामीजी)
 
की शिष्या
अडियेन 
श्रीरंजनि जगन्नाथन
(सम्प्रदाय अनुष्ठान रक्षण अभिमान - SARAN सेवक)
17-10-2025

0003 - आचार्यों की महानता

श्रीः

जय गरुड सुपर्णः 

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0003 - आचार्यों की महानता 

आचार्यों की महिमा

स्वामी श्री वेदांत देशिकाचार्य  ने “श्रीमद्रहस्यत्रयसारः” के गुरुपरंपरासार:  में आचार्यों की महानता और उनके द्वारा शिष्यों को दी जाने वाली कृपा को अत्यंत सुंदर रीति से एक श्लोक के माध्यम से समझाया है —

श्लोकः —
एते मह्यमपोढ मन्मथ शरोन्माथाय नाथादयः ।
त्रैय्यन्त प्रति-नन्दनीय विविधो-दन्ताः स्वदन्तामिह ।
श्रद्धातव्य-शरण्य-दंपति-दया दिव्यापगा-व्यापकाः ।
स्पर्धा-विप्लव-विप्रलम्भ-पदवी वैदेशिका देशिकाः ॥
(श्रीगुरुपरंपरासारः — श्रीमद्रहस्यत्रयसारः )

भावार्थ:
श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के आचार्यगण नाथमुनि आदि  कैसे हैं?

1) वे ऐसे महापुरुष हैं जिनका चरित्र इतना पवित्र और आदर्श है कि स्वयं वेदांत शास्त्र उनकी महिमा का गुणगान करते हैं।

2)  वे कल्याणगुणों से संपन्न दिव्य दम्पति — श्री लक्ष्मी-नारायण — की करुणा रूपी गंगा को इस संसार में प्रवाहित करते हैं, जिससे हम सब उनके चरणों में शरणागति प्राप्त कर सकें।

3) वे अहंकार, छल-कपट, प्रतिस्पर्धा, और असत्य आचरण से सदा दूर रहते हैं।

ऐसे आचार्य ही हमें मन विकारों और कामदेव के वश से मुक्त करते हैं।
उनकी कृपा से हम परमपद को प्राप्त होकर अनन्त आनन्द का अनुभव कर सकें — यही हमारी प्रार्थना है।

भगीरथ के महान प्रयत्न के समान 

श्री ए.पी.एन. स्वामी ने इस श्लोक का भाव स्पष्ट करते हुए आचार्यों की करुणा और उनके उपकारों के अनेक अद्भुत पहलू अत्यंत सुंदर रूप में बताए।

भगवान्‌ के परम भक्त भगीरथ के समान ही हमारे आचार्यगण भी हैं।

जिस प्रकार भगीरथ ने अपने पितरों की मुक्ति के लिए अद्भुत तप किया और सत्यलोक से गंगा को पृथ्वी पर लाकर अपने पितरों को उद्धार प्रदान किया, उसी प्रकार हम सब भी संस्काररहित, जले हुए भस्म के समान जीवन जी रहे हैं — संस्कारहीन, संसार-ताप से तप्त जीवात्माएँ

ऐसे समय में हमें उद्धार देने वाली केवल एक ही शक्ति है —
श्रीमन नारायण और श्री महालक्ष्मी की दया रूपी करुणा-गंगा (दया–करुणा–प्रवाहम्)।

और इस दिव्य करुणा-गंगा को हम तक पहुँचाने वाले हमारे आचार्य ही हैं।

इस उपमा का भाव इस प्रकार है —

उपमा -  दार्शनिक अर्थ  - संस्कृत शब्द

1) भगीरथ  - आचार्यगण - नाथादयः, देशिकाः

2) गंगा - दिव्य दम्पति की दया – प्रवाह दिव्यापगा

3) भगीरथ के पितर - संसार में फँसे हुए जीवात्मा

जब आचार्यों के माध्यम से श्रीमन नारायण और श्रीदेवी की यह दया–गंगा हमारे भीतर प्रवाहित होती है, तब हमारे भीतर के काम, लोभ, और मनमथ-बाण जन्य विकार दूर हो जाते हैं।  मन शुद्ध, निर्मल और शांत हो जाता है।

स्वामीजी श्री वेदांत देशिकाचार्य  ने  कहते हैं कि आचार्य और उनके उपदेश सदा हमारे हृदय में निवास करें — वे हमारे मार्गदर्शक बनें और हमें इस संसार के ताप से मुक्त कर परम आनन्द की ओर ले जाएँ।

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जय गरुड सुपर्णः

श्री देशिक दिव्य पादुका सेवक वाचस्पति डॉ. श्री उ.वे. मुकुन्दगिरि वङ्कीपुरम् अनन्त पद्मनाभाचार्य (श्री ए.पी.एन. (APN) स्वामीजी)
 
की शिष्या
अडियेन 
श्रीरंजनि जगन्नाथन
(सम्प्रदाय अनुष्ठान रक्षण अभिमान - SARAN सेवक)
17-10-2025

0002 - स्वमीजी श्री वेदांत देशिकाचार्य के श्रीमद्रहस्यत्रयसारः अधिकारों के नाम एवं संक्षिप्त भावार्थ

श्रीः

जय गरुड सुपर्णः 

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स्वमीजी श्री वेदांत देशिकाचार्य  के  श्रीमद्रहस्यत्रयसारः अधिकारों के नाम एवं संक्षिप्त भावार्थ 


 स्वमीजी श्री वेदांत देशिकाचार्य (स्वामी देशिकन) के श्रीमद्रहस्यत्रयसारः ग्रंथ में कुल 32 अधिकार (अध्याय) हैं।  ये चार भागों में विभाजित हैं। यहाँ इन अधिकारों के संक्षिप्त भावार्थ बताए गए हैं।

I) अर्थानुशासन भागम

0 - श्रीगुरुपरंपरासारः (गुरुपरंपरा सारः) – इस अधिकार में हमारे आचार्य-गुरु-परंपरा का वर्णन किया गया है। श्रीमद्रहस्यत्रयसारः  को समझने के लिए गुरु-परंपरा को जानना अत्यंत आवश्यक है। कुछ लोग इसे एक स्वतंत्र ग्रंथ मानते हैं, परंतु इञ्जीमेडु श्रीमत् अळगियसिंघर ने कहा है कि यह श्रीमद्रहस्यत्रयसारः  का ही अंग है। इस ग्रंथ की शुरुवात “दंपती जगतां पती” से होती है और अंत में “शरण्यदंपति” शब्द के साथ समाप्त होती है, जिससे स्पष्ट होता है कि श्रीमद्रहस्यत्रयसारः  दिव्य दंपति (शरण्य-शेषि दंपति) की महिमा बताता है।

1 – उपोद्घाताधिकारः (प्रस्तावना अधिकार) – ‘उपोद्घात’ का अर्थ है प्रस्तावना। यह अधिकार ग्रंथ की भूमिका के समान है।

2 – सारनिष्कर्षाधिकारः (सार निष्कर्ष अधिकार) – जीवात्मा को जानने योग्य सर्वोत्तम तत्त्वों का निरूपण करता है।

3 – प्रधानप्रतितन्त्राधिकारः (प्रधान प्रतितन्त्र अधिकार) – श्रीवैष्णव सिद्धांत के विशिष्ट (असाधारण) तत्त्वों की व्याख्या करता है, जैसे तीन तत्त्व, तीन रहस्य, शरीर-आत्मभाव, अधार-आधेयभाव, नियंता-नियम्यभाव, शेषि-शेषभाव, स्वामी-दासभाव आदि।

4 – अर्थपञ्चकाधिकारः (अर्थ पंचक अधिकार) – मोक्ष की इच्छा रखने वाले मुमुक्षु को जानने योग्य पाँच विषयों का निरूपण करता है।

5 – तत्त्वत्रयचिन्तनाधिकारः (तत्त्वत्रय चिंतन अधिकार) – चित्, अचित्, ईश्वर – इन तीन तत्त्वों का स्वरूप, स्वभाव, स्थिति और प्रवृत्ति का वर्णन करता है।

6 – परदेवतापारमार्थ्याधिकारः (परदेवता पारमार्थ्य अधिकार) – यह अधिकार बताता है कि परदेवता कौन है। इसमें  प्रधान विषयम - "परदेवता को जानने वाला ही मोक्ष प्राप्त कर सकता है।"

7 – मुमुक्षुत्वाधिकारः (मुमुक्षुत्व अधिकार) – मोक्ष की इच्छा रखने वाले जीव (मुमुक्षु) की भावनाओं को समझाता है।

8 – अधिकारिविभागाधिकारः (अधिकारि विभाग अधिकार) – मोक्ष की इच्छा रखने वाले साधकों के विभिन्न प्रकारों का विवरण करता है।

9 – उपायविभागाधिकारः (उपाय विभाग अधिकार) – मोक्ष के सिर्फ दो उपायों – भक्ति और प्रपत्ति – के भेदों का निरूपण करता है।

10 – प्रपत्तियोग्याधिकारः (प्रपत्ति योग्य अधिकार) – जो जीव  प्रपत्ति के योग्य हैं, उनका स्वरूप बताता है।

11 – परिकरविभागाधिकारः (परिकर विभाग अधिकार) – प्रपत्ति के अंगों का (parts) विवेचन करता है।

12 – साङ्गप्रपदनाधिकारः (सांग प्रपादन अधिकार) – पाँच अंगों सहित प्रपत्ति का आचरण कैसे किया जाए, यह बताता है।

13 – कृतकृत्याधिकारः (कृतकृत्य अधिकार) – प्रपत्ति होने के बाद जीव “कृतकृत्य” कहलाता है। उसने अपनी जिम्मेदारी भगवान को सौंप दी है और निश्चिंत होकर जीता है।

14 – स्वनिष्ठाभिज्ञानाधिकारः (स्वनिष्ठा ज्ञान अधिकार) – प्रपन्न जीव अपने आचरण से अपनी निष्ठा (स्वनिष्ठा) को पहचानता है।

15 – उत्तरकृत्याधिकारः (उत्तर कृत्य अधिकार) – प्रपत्ति के बाद जीव को कौन-कौन से कर्म करने चाहिए, यह बताता है।

16 – पुरुषार्थकाष्ठाधिकारः (पुरुषार्थ काष्ठ अधिकार) – प्रपन्न के लिए परम पुरुषार्थ भगवत्-कैङ्कर्य (भगवान की सेवा) है। इसका सर्वोच्च रूप भागवत-कैङ्कर्य है।

17 – शास्त्रीयनियमनाधिकारः (शास्त्रीय नियमन अधिकार) – प्रपन्न को अपने सभी कार्य शास्त्र के अनुसार करने चाहिए।

18 – अपराधपरिहाराधिकारः (अपराध परिहार अधिकार) – प्रपन्न द्वारा किए गए पापों के प्रायश्चित्त के उपाय बताता है।

19 – स्थानविशेषाधिकारः (स्थान विशेष अधिकार) – प्रपन्न के रहने योग्य स्थानों का वर्णन करता है।

20 – निर्याणाधिकारः (निर्वाण अधिकार) – शरीर से आत्मा के प्रस्थान की प्रक्रिया बताता है।

21 – गतिचिन्तनाधिकारः (गति चिंतन अधिकार) – आत्मा मोक्ष की ओर कैसे जाती है, उसकी “गति” का वर्णन करता है। इस गति को हम रोज चिंतना करना चाहिए | 

22 – परिपूर्णब्रह्मानुभवाधिकारः (परिपूर्ण ब्रह्मानुभव अधिकार) – मोक्ष प्राप्त आत्मा किस प्रकार परमात्मा का परिपूर्ण अनुभव करती है, यह बताता है।

II) स्थिरीकरण भागम

23 – सिद्धोपायशोधनाधिकारः (सिद्धोपाय शोधन अधिकार) – नित्य उपाय (सिद्धोपाय) भगवान विष्णु के विषय में उठने वाले संदेहों का समाधान करता है।

24 – साध्योपायशोधनाधिकारः (साध्योपाय शोधन अधिकार) – साध्योपाय (भक्ति, प्रपत्ति) से संबंधित संदेहों का समाधान करता है।

25 – प्रभावव्यवस्थाधिकारः (प्रभाव व्यवस्था अधिकार) – प्रपत्ति की महानता को बिना कमी के स्थापित करता है।

26 – प्रभावरक्षाधिकारः (प्रभाव रक्षा अधिकार) – प्रपत्ति की महिमा को घटाए बिना उसकी रक्षा कैसे की जाए, यह बताता है।

III) पदवाक्ययोजन भागम् (मंत्र भाग)

27 – मूलमन्त्राधिकारः (मूलमंत्र अधिकार) – रहस्यत्रय में प्रथम ‘मूलमंत्र’ (अष्टाक्षर) का महत्व बताता है।

28 – द्वयाधिकारः (द्वय अधिकार) – रहस्यत्रय में द्वितीय ‘द्वयमंत्र’ का अर्थ स्पष्ट करता है।

29 – चरमश्लोकाधिकारः (चरमश्लोक अधिकार) – रहस्यत्रय में तृतीय ‘चरमश्लोक’ का अर्थ बताता है।

1V) संप्रदायप्रक्रिया भागम् (आचार्य-शिष्य भाग)

30 – आचार्यकृत्याधिकारः (आचार्य कृत्य अधिकार) – आचार्य के कर्तव्यों का वर्णन करता है।

31 – शिष्यकृत्याधिकारः (शिष्य कृत्य अधिकार) – उत्तम शिष्य के कर्तव्यों को बताता है।

32 – निगमनाधिकारः (निगमन अधिकार) – पूर्व के सभी अधिकारों का सार प्रस्तुत करते हुए ग्रंथ का समापन करता है।

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जय गरुड सुपर्णः

श्री देशिक दिव्य पादुका सेवक वाचस्पति डॉ. श्री उ.वे. मुकुन्दगिरि वङ्कीपुरम् अनन्त पद्मनाभाचार्य (श्री ए.पी.एन. (APN) स्वामीजी)
 
की शिष्या
अडियेन 
श्रीरंजनि जगन्नाथन
(सम्प्रदाय अनुष्ठान रक्षण अभिमान - SARAN सेवक)
17-10-2025

0001 - स्वमीजी श्री वेदांत देशिकाचार्य के तीन ‘तनियन’

श्रीः 
जय गरुड सुपर्णः 

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स्वमीजी श्री वेदांत देशिकाचार्य के तीन ‘तनियन’


आळवारों या आचार्यों के ग्रंथों या पदों का पाठ करने से पहले, उनकी स्तुति और सम्मान में रचे गए गीतों को गाने की परंपरा हमारे श्रीवैष्णव संप्रदाय में प्रचलित है। ऐसे पद जो आळवारों और आचार्यों के प्रति हमारी विनम्र वंदना को प्रकट करते हैं, उन्हें “तनियन” कहा जाता है।

‘तनियन’ शब्द के दो अर्थ हैं —
यह किसी व्यक्ति की स्तुति करने वाला पद होने के कारण तनियन कहलाता है।
और क्योंकि यह किसी अन्य ग्रंथ पर आधारित न होकर स्वतंत्र रूप से रचा गया पद होता है, इसलिए भी इसे तनियन कहा जाता है।

स्वमीजी श्री वेदांत देशिकाचार्य की महिमा का वर्णन करने वाले तीन प्रमुख तनियन हैं।  जैसे श्रीवैष्णव परंपरा में तत्त्वत्रयम् (तीन तत्त्व) और रहस्यत्रयम् (तीन रहस्य) हैं, वैसे ही देशिक भक्तों को जानने योग्य तीन तनियन भी हैं।
अब हम उन तीनों का भावानुवाद देखते हैं —

1 - श्री नयनाराचार्य द्वारा रचित संस्कृत तनियन
श्लोकः
श्रीमान् वेङ्कटनाथार्यः कवितार्किक केसरी ।
वेदान्ताचार्य वर्यो मे सन्निधत्तां सदा हृदि ॥
भावार्थ:
सभी दिव्य गुणों से संपन्न, कवियों और तर्कशास्त्रियों में सिंह समान, वेदान्ताचार्यों में श्रेष्ठ,
ऐसे श्रीवेंकटनाथ (स्वामी वेदान्त देशिकन) मेरे हृदय में सदा विराजमान रहें।

यह तनियन कली वर्ष 4430, विभव वर्ष, चैत्र मास की पुनर्वसु नक्षत्र के दिन, स्वामी देशिकन के पुत्र श्री नयनाराचार्य ने केवल 12 वर्ष की आयु में श्रीरंगम् में रचा, जब वे स्वामी से श्रीभाष्य का अध्ययन कर रहे थे। यह तनियन देशिकन के संस्कृत ग्रंथों और स्तोत्रों का पाठ करते समय गाया जाता है।

2 -  श्री ब्रह्मतंत्र स्वतंत्र स्वामी द्वारा रचित संस्कृत तनियन
श्लोकः
रामानुज दयापात्रं ज्ञान वैराग्य भूषणम् ।
श्रीमद्वेङ्कटनाथार्यं वन्दे वेदान्त देशिकम् ॥
भावार्थ:
जो श्रीरामानुज और अपने आचार्य आत्रेय रामानुजाचार्य (अप्पुल्लार) की कृपा के पात्र हैं,
जो ज्ञान और वैराग्य के आभूषणों से विभूषित हैं,
ऐसे श्रीमद्वेङ्कटनाथ नाम वाले स्वामी वेदान्त देशिकन को मैं वंदन करता हूँ।

जब स्वामी देशिकन को मेलकोट जाना पड़ा, तब उनके शिष्य श्री ब्रह्मतंत्र स्वतंत्र स्वामी ने उनके पुत्र श्री नयनाराचार्य से “भगवद्विषयम्” (अर्थात् तिरुवायमोजि की व्याख्या तिरुआरायिरप्पडी – 6000 पडी) का अध्ययन किया। उन्होंने उसी समय स्वामी देशिकन द्वारा रचित निगमपरिमलम् (अर्थात् तिरुवायमोजि की व्याख्या 74000 पडी) भी सीखा। देशिकन के इस अद्भुत ग्रंथ की महिमा से प्रभावित होकर उन्होंने बहुदान्य वर्ष, भाद्रपद मास, शुक्ल पक्ष द्वितीया के शुभ दिन यह तनियन रचा और स्वामी के चरणों में अर्पित किया। स्वामी देशिकन ने भी इसे स्वीकार किया और आदेश दिया कि यह तनियन दिव्य प्रबन्ध के पाठ से पहले गाया जाए।

3 -  श्री पिल्लै लोकाचार्य द्वारा रचित तमिल तनियन
तमिल पासुरम:
சீர் ஒன்று தூப்புல் திருவேங்கடமுடையான்
பார் ஒன்றச் சொன்ன பழமொழியுள் - ஓர் ஒன்று
தானே அமையாதோ தாரணியில் வாழ்வார்க்கு
வான் ஏறப் போம் அளவும் வாழ்வு.
शीर् ओन्ऱु तूप्पुल् तिरुवेङ्कटमुडैयाऩ्
पार् ओन्ऱ च्चोऩ्ऩ पऴ्मोऴियुळ् - ओर् ओन्ऱु
ताने अमैयादो तारणियिल् वाऴ्वार्क्कु 
वाऩ् एऱ प्पोम् अळवुम् वाळवु

भावार्थ:
धरणी (पृथ्वी) पर रहने वालों को परमपद (मोक्ष) का मार्ग दिखाने वाले, दिव्य गुणों से युक्त, तूप्पुल क्षेत्र में वेंकटेश के रूप में अवतरित स्वामी देशिकन — जिन्होंने लोकहित के लिए प्राचीन ग्रंथों और उपदेशों को दिया — क्या उनके उन उपदेशों में से एक अंश भी संसार के लोगों के लिए पर्याप्त नहीं है?
(अर्थात् उनकी शिक्षाओं का थोड़ा-सा भी भाग जीवन को सफल बनाने के लिए पर्याप्त है।)

श्री पिल्लै लोकाचार्य ने श्रीरंगम् में स्वामी देशिकन से श्रीभाष्य और रहस्यार्थ का अध्ययन किया था। देशिकन की महिमा का प्रचार करने के लिए उन्होंने यह तनियन रचा और स्वामी को समर्पित किया। यह तनियन श्रीमद् रहस्यत्रय सारम्, चिल्लरैरहस्यों और देशिक प्रबन्ध तमिल पासुरम के पाठ के पहले गाया जाता है।
निष्कर्ष स्वामी देशिकन के ग्रंथ ही नहीं, बल्कि उनके तनियन भी हमें आध्यात्मिक रूप से ऊँचा उठाने के लिए रचे गए हैं। 

ये तीनों तनियन ही वास्तव में प्रत्येक देशिक भक्त के लिए नित्य अनुसंधान (दैनिक ध्यान) के योग्य रहस्यत्रयम् हैं।

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जय गरुड सुपर्णः

श्री देशिक दिव्य पादुका सेवक वाचस्पति डॉ. श्री उ.वे. मुकुन्दगिरि वङ्कीपुरम् अनन्त पद्मनाभाचार्य (श्री ए.पी.एन. (APN) स्वामीजी)
 
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अडियेन 
श्रीरंजनि जगन्नाथन
(सम्प्रदाय अनुष्ठान रक्षण अभिमान - SARAN सेवक)
17-10-2025